द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को सुनाई गीता इस कलयुग में सबसे दुर्लभ ग्रंथों में से एक है ! गीता ज्ञान और विज्ञानं से भरी हुयी है ! गीता का मूल प्रमाण अंधकार से निकल कर प्रकाश की और जाना है ! सत्व, राजस, तामस से भी परे, सुख, एवं दुःख, भी परे, मान अपमान से भी परे, हानि और लाभ से भी परे "परमात्मा" है
! *भगवान अर्जुन को कहते है* !
*!! अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित कर्तुमर्हति !! २.१७ !!*
नाश रहित तू उसको जान जिससे यह सम्पूर्ण जगत-दृश्य वर्ग व्यापत है ! इस अविनाशी का विनाश करने में कोई समर्थ नही !
परम+आत्मा = परमात्मा (जिसका विनाश न हो )
जब हम इन्द्रियों द्वारा विषय का भोग करते है तो ये वास्तव में हमारा शरीर करता है, आत्मा का इससे कोई लेना देना नही लेकिन जब हम आत्मा द्वारा कोई कार्य करते है तो उसमे इन्द्रियों का कोई लेना देना नही होता ,क्यों के हम जो कार्य करते है उसमे तीन गुण सत्व, राजस, तामस, सम्मलित होते है, दान,सेवा, जप-तप, आदि हम तीनो गुणों में से एक के अधीन होकर करते है,
कृपया ध्यान दें,
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ
शरीर क्षेत्र है और इसके तत्व को जानने वाला क्षेत्रज्ञ है !
*!! महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च। इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः।।13.6।।*
पांच महाभूत, अहंकार, बुद्धि और मूल प्रकृति भी तथा दस इन्द्रियां एक मन और पांच इन्द्रियों के विषय अर्थात शब्द, स्पर्श, रूप,रस, और गंध
*!! इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतनाधृतिः। एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ।।13.7।।*
तथा इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, स्थूल देहका पिंड चेतना और धृति इस प्रकार विकारों के सहित यह क्षेत्र संक्षेप में कहा गया !
*!! सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः।निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ।।14.5।।*
हे अर्जुन ! सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण -ये प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बांधते है !
*!! सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत।ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत।।14.9।।*
हे भारत ! सत्वगुण सुख में लगाता है और रजोगुण कर्ममें तथा तमोगुण तो ज्ञान को ढककर प्रमादमें भी लगाता है !
*!! कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्। रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्।।14.16।।*
श्रेष्ठ कर्मका तो सात्विक अर्थात सुख, ज्ञान, और बैराग्य आदि निर्मल फल कहा है ; राजस कर्म का फल दुःख एवं तामस कर्म का फल अज्ञान कहा है !
इस प्रकार मनुष्य गुणों के अंतर कर्म करता है !
सात्विक स्वर्ग को प्राप्त होता है , राजस मृत्युलोक मे तथा तामस नरक लोक में कर्म भोगता है !
लेकिन मृत्यु हर जगह है,
*इसी लिए गीता दुर्लभ*
*!! गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्।जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ।।14.20।।*
यह पुरुष शरीर की उत्पत्ति के कारणरूप इन तीनों गुणों को उल्लंघन करके जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और सब प्रकार के दुखों से मुक्त हुआ परमानन्द को प्राप्त होता है !
लेकिन ऐसी कौन सी जगह है, जहां मृत्यु नही है ! हर प्राणी मृत्यु द्वारा निगल लिया जायेगा
*!! मोक्ष !!*
*!! न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।।15.6।।*
जिस परम पद को प्राप्त होकर मनुष्य लौटकर संसार में नही आते, उस स्वयंप्रकाश परमपद को न सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चन्द्रमा और न अग्नि ही; वही मेरा परम धाम है !
सत्व, राजस, तामस से भी परे, सुख, एवं दुःख उपर्युक्त परमात्मा के उपदेश अनुसारआत्मतत्व को जान लें ! लेकिन आत्मा को जानना सरल नही इसके लिए अभ्यास जरूरी है ये अभ्यास हम गीता के द्वारा ही सीख सकते है ! मोक्ष परमात्मा का परम् धाम है, जब हम आत्मा परम बना लेते है, हर प्राणी को समदृष्टि से अर्थात "परमात्मा को ही सब में देख कर उनकी सेवा करना, उनपे दया करना, यथार्थ सहित धन से अन्न से, वस्त्र से, वाणी से आदि" देखते है, और दूसरों को इस रास्ते पर चलने को उत्सुक करते है तो हम मोक्ष के मार्ग पर है , और आप सदैव के लिए मृत्यु से मुक्त हो जायेंगे
*!!श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते।ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्।।12.12।।*
मर्म को न जानकर किये हुए अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है ;ज्ञान से परमात्मा का ध्यान श्रेष्ठ है और ध्यान से भी सब परमार्थ कर्मोके फलका त्याग श्रेष्ठ है क्योंके त्याग से तत्काल शांति मिलती है !
*!! अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी।।12.13।।*
*!! सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः।।12.14।।*
जो पुरुष सब भूतोंमें द्वेष भाव से रहित, स्वार्थ रहित, सबका प्रेमी और हेतु रहित दयालु है तथा ममता से रहित, अहंकार से रहित, सुख दुखों की प्राप्ति में सम और क्षमावान है अर्थात अपराध करने वाले को भी अभय देनेवाला है; तथा यो योगी निरंतर संतुष्ठ है, मन इन्द्रियों सहित शरीर को वश में किये हुए है और मुझमें(परमात्मा) में दृढ निश्चय वाला है-वह मुझे अर्पण किये हुए मन बुद्धिवाला परमात्मा को प्रिय है और वह मोक्ष को प्राप्त होकर मृत्यु से मुक्त हो जाता है !

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